बाल मजदूर से सुपरस्टार बनने की सच्ची कहानी

नई दिल्ली, 13 दिसंबर। पीएस विनोदराज की बहुत कम बजट में बनी फिल्म 'कूजंगल', जिसे अंग्रेजी में 'पेबल्स' नाम दिया गया है, इस बार के ऑस्कर्स में भारत की आधिकारिक एंट्री है. 32 साल के विनोदराज के लिए अपनी जिंदगी की मुश्किलों से सामना करने का हौसला इस फिल्म के लिए प्रेरणा बना.
वह बताते हैं, "मेरे असल जिंदगी के अनुभवों ने मुझे मजबूत बनाया और इस फिल्म को बनाने में भी मदद की. वैसी जिंदगी ही फिल्म बन गई है. विनोदराज ने अपने परिवार को भीषण गरीबी के कुचक्र से निकाला. अपनी बहन को घरेलू हिंसा से बचाया और एक शराबी पिता की कठोरता को भी झेला. ये सारे अनुभव उनकी इस फिल्म में सिमट आए हैं जिसे आलोचकों ने 'मास्टरपीस' और 'सनसनीखेज शुरुआत' जैसे विशेषणों से नवाजा है.
खूब नाम कमा रही है फिल्म
फिल्म पहले ही बहुत नाम कमा चुकी है. इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल रॉटरडम में उसे टाइगर अवॉर्ड मिला. वहां निर्णायकमंडल ने कहा कि देखने में यह बहुत सादी लगती है लेकिन फिल्म शुद्ध सिनेमा का एक सबक है
विनोदराज तमिल सिनेमा के उन निर्देशकों में से एक हैं जो बेहद गरीब परिवार से आते हैं. इसका असर उनके सिनेमा पर भी दिखता है. अगर फिल्म को अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में जगह ना मिलती तो विनोद इसे उन गांवों दिखाने वाले थे जहां इसकी शूटिंग हुई. फिल्म की पूरी शूटिंग में एक्टर और क्रू समेत कुल 40 लोगों ने ही काम किया.

इस फिल्म विनोद ने एक बच्चे की कहानी सुनाई है जो गरीबी से उठकर फिल्मकार बनता है. विनोद कहते हैं कि उनकी जिंदगी में इतना कुछ हुआ जिसने इस फिल्म के लिए उन्हें तैयार किया. उन्होंने 9 साल की उम्र में अपने पिता की मौत के बाद मदुरै में फूल बेचकर अपने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठा ली थी.

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